अंततः वह दिन आता है जब “ह्यूमन ट्रांसमिशन मशीन” का परीक्षण किया जाना है। प्रोफेसर रामिश स्वयं मशीन में प्रवेश कर एक प्रयोगशाला से दूसरी प्रयोगशाला तक ट्रांसमिट होने का निर्णय लेते हैं। महक दूरस्थ नियंत्रण प्रणाली के द्वारा दूसरी प्रयोगशाला से पूरे प्रयोग को नियंत्रित करती है।
ट्रांसमिशन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। लेकिन तभी प्रयोगशाला में धुआँ भरने लगता है, जिससे मशीन के काम में बाधा आने का खतरा पैदा हो जाता है। दूसरी ओर, जिस प्रयोगशाला में महक मौजूद है, वहाँ बिजली चली जाती है।
महक के कहने पर उसका भाई लाइनमैन को लेकर बिजली ठीक कराने जाता है। इसी बीच एक टीवी चैनल की ओ.बी. वैन वहां आती है। वह अपनी वैन से प्रयोगशाला में बिजली सप्लाई करती है। लेकिन तभी लाइट आ जाती है और दोनों फेज़ एक साथ जुड़ जाने के कारण मशीन में स्पार्किंग होने लगती है। इससे सभी लोग चिंतित हो जाते हैं।
काफी संघर्ष के बाद अंततः प्रयोग सफल होता है और प्रोफेसर रामिश रिसीवर से बाहर निकलते हैं। लेकिन मशीन में फँसे रहने के दौरान उनकी विचारधारा परिवर्तित हो जाती है। उन्हें अपने बचपन की याद आती है, जब वे अभावग्रस्त जीवन जीने को विवश थे। वे आत्ममंथन करते हैं कि वैज्ञानिक उपलब्धि की दौड़ में उन्होंने समाज के उन लोगों को पीछे छोड़ दिया, जो अब भी उसी कठिन जीवन में संघर्ष कर रहे हैं। अंततः वे अधजली ट्रांसमिशन मशीन को पीछे छोड़कर अपने ज्ञान और क्षमता का उपयोग समाज के वंचित वर्ग के उत्थान में लगाने का निर्णय लेते हैं। महक और उसका परिवार भी इस मानवीय उद्देश्य में उनका साथ देने के लिए उनके साथ खड़े हो जाते हैं।
यह उपन्यास उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ की द्वैमासिक पत्रिका ‘बालवाणी’ (मार्च-अप्रैल 2017 से नवम्बर-दिसम्बर 2018 तक) में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। बाद में इसे “ह्यूमन ट्रांसमिशन एवं अन्य विज्ञान कथाएं” संग्रह में सम्मिलित किया गया, जिसका प्रकाशन वर्ष 2017 में आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा किया गया।
बाल उपन्यास 'समय के पार' एक रोचक साइंस फैंटेसी रचना है, जिसके लेखक ज़ाकिर अली 'रजनीश' हैं। यह उपन्यास पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की चेतावनी पर आधारित है।
कहानी के केंद्र में वैज्ञानिक प्रोफेसर हसन हैं, जिन्होंने 'समययान' नामक मशीन का आविष्कार किया है, जिसके माध्यम से समय में आगे-पीछे यात्रा संभव है। इस रहस्य का पता कुछ अपराधियों को चल जाता है, जो प्रोफेसर के मुंहबोले भतीजे प्रकाश का अपहरण कर लेते हैं और बदले में समययान का सूत्र मांगते हैं। प्रोफेसर हसन आधुनिक तकनीक और पुलिस की सहायता से अपराधियों को पकड़ने और प्रकाश को सुरक्षित छुड़ाने में सफल हो जाते हैं।
इसके बाद प्रोफेसर हसन और प्रकाश समययान द्वारा 25वीं सदी में पहुँचते हैं। वहाँ वे देखते हैं कि पूरा शहर रेगिस्तान में बदल चुका है, आसमान से अल्ट्रावायलेट किरणों के रूप में आग बरस रही है। इसकी वजह से सारा शहर वीरान पड़ा हुआ है। दोनों लोग स्पेस सूट पहनकर बाहर निकलते हैं, लेकिन उन्हें वहाँ की सरकार द्वारा पकड़कर इलेक्ट्रिक पिंजरे में कैद कर लिया जाता है।
प्रोफेसर हसन को पता चलता है कि 25वीं सदी के लोग जमीन के नीचे रहने को मजबूर हैं। उन्हें न शुद्ध हवा मिलती है, न सूर्य का प्रकाश। इस वजह से वे लोग शारीरिक रूप से कमजोर और कंकाल जैसे हो गए हैं। यह स्थिति देखकर प्रोफेसर हसन स्तब्ध रह जाते हैं।
तत्कालीन समय के प्रशासक (सभापति) की लड़की खुश्बू उन लोगों को पिंजरे से आजाद कराती है और मेहमान के रूप में अपने घर ले जाती है। उसके पिता दोनों का स्वागत करते हैं। खुश्बू प्रकाश को 25वीं सदी की सैर कराती है।
25वीं सदी के लोग मानते हैं कि उनकी इस दुर्दशा के जिम्मेदार प्रोफेसर हसन और उनकी पीढ़ी है। इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है और उन्हें मृत्युदंड देने का निर्णय लिया जाता है।
लेकिन तभी प्रशासक की पुत्री खुश्बू हस्तक्षेप करती है। वह तर्क देती है कि यदि इन्हें मार दिया गया, तो कोई बदलाव संभव नहीं होगा। लेकिन अगर इन्हें वापस भेजा जाए, तो ये अपने समय में जाकर लोगों को सच बताएंगे। इससे भविष्य बदला जा सकता है। अदालत उसके तर्क से सहमत होकर दोनों को रिहा कर देती है।
प्रोफेसर हसन और प्रकाश खुश्बू का धन्यवाद करते हैं और समययान से वापस अपने समय की ओर लौट पड़ते हैं। यह अनुभव उनके लिए एक गहरी चेतावनी बन जाता है कि यदि वर्तमान पीढ़ी पर्यावरण की रक्षा नहीं करेगी, तो भविष्य की पीढ़ियों को भयानक परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
यह पुस्तक प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली (2000) द्वारा प्रकाशित हुई है। पुस्तक में 'समय के पार' बाल उपन्यास सहित आठ विज्ञान कथाएं भी संकलित हैं। इस पुस्तक को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों जैसे: भारतेन्दु पुरस्कार, रतन शर्मा स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का सर्जना पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
हम होंगे कामयाब : बाल अधिकारों पर केंद्रित साहसिक उपन्यास
'हम होंगे कामयाब' बाल अधिकारों और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष पर आधारित एक बाल उपन्यास है। इसके लेखक ज़ाकिर अली 'रजनीश' हैं। कहानी के केंद्र में तीन मुख्य पात्र हैं- रवि, अंजुम और किशोर। एक दिन रास्ते में अंजुम का सामना उसके बचपन के मित्र किशोर से होता है, लेकिन किशोर बिना कुछ कहे वहाँ से चला जाता है। उसकी दशा देखकर अंजुम चिंतित हो जाता है।
अंजुम अपने दोस्त रवि के साथ लक्खूलाल के अड्डे पर जाकर, जहाँ बंधुआ मजदूरों को रखा जाता है, किशोर से मिलता है। किशोर बताता है कि उसके पिता शराब के आदी थे और एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी थी। उसकी माँ इस आघात को सहन नहीं कर पाईं और मानसिक संतुलन खो बैठीं। उसके पिता द्वारा लिये गये कर्ज के कारण सेठ लक्खूलाल के लोग उसे पकड़कर अपना बंधुआ मजदूर बना लेते हैं।
रवि अपने दादाजी से इस समस्या पर चर्चा करता है। दादाजी उनके इस नेक प्रयास की सराहना करते हैं और उन्हें बाल अधिकारों की जानकारी देते हैं। साथ ही वे उन्हें समझदारी, धैर्य और योजनाबद्ध तरीके से काम करने की सलाह देते हैं।
लक्खूलाल के खिलाफ सुबूत जुटाने के दौरान अंजुम के पैर में गोली लगती है और वह सेठ के गुंडों की पकड़ में आ जाता है। उसे अन्य बंधक लड़कों के साथ एक अनाथ आश्रम में शिफ्ट कर दिया जाता है। अंजुम की मरहम-पट्टी के लिए एक डॉक्टर आता है। अंजुम अपना वह टेपरिकार्डर, जिसमें बंधक बच्चों के बयान दर्ज हैं, चुपके से डॉक्टर के बैग में रख देता है।
अंजुम के गायब हो जाने से उसके तथा रवि के घर वाले चिंतित होते हैं। वे पुलिस पर दबाव डलवा कर सेठ के अड्डे पर छापा डलवाते हैं, लेकिन अंजुम व अन्य बच्चों को अनाथ आश्रम पहुंचा दिये जाने के कारण उन्हें वहां से खाली हाथ लौटना पड़ता है।
अगले दिल डॉक्टर को अपने बैग में अंजुम का टेपरिकार्डर मिलता है। वे टेप रिकॉर्डर पर लगे स्कूल के स्टीकर को देखकर उसे अंजुम के स्कूल पहुँचा देते हैं। साथ ही वे बताते हैं कि अंजुम को संभवतः महात्मा गांधी रोड स्थित किसी आश्रम में रखा गया है। लेकिन दिक्कत की बात यह थी उस रोड पर तीन अनाथ आश्रम थे। इसलिए बिना पुख्ता सबूत के वहां छापा मारना सम्भव नहीं हो पाता है।
यह सुनकर रवि एक योजना बनाता है। वह सभी आश्रमों के सामने से बच्चों की टीम लेकर ऊँची आवाज में 'हम होंगे कामयाब' गाना गाता हुआ गुजरता है। आश्रम में कैद अंजुम उनके सुर में सुर मिलाता है। बाकी के बच्चे भी उसका अनुसरण करते हैं। संकेत मिलते ही पुलिस सक्रिय होकर उस आश्रम पर छापा मारती है और सभी बच्चों को छुड़ा लेती है। इस प्रकार अंजुम, किशोर और अन्य तमाम बच्चे अपने घरवालों के पास पहुंच जाते हैं।
अंजुम को चित्रकारी का शौक है, लेकिन उसके अब्बू इसे समय की बर्बादी मानते हैं। लेकिन इस पूरे अभियान का असर उसके अब्बू पर भी पड़ता है। वे अंजुम के साहसिक कार्य के लिए उसे कलर बॉक्स इनाम में देते हुए कहते हैं कि बच्चों को उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार भी तो मिलना चाहिए। इस प्रकार उपन्यास का समापन होता है।
बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत यह उपन्यास ‘बाल भारती’ पत्रिका (मई 1999–जून 2000) में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ तथा बाद में सन 2000 में विद्यार्थी प्रकाशन, लखनऊ से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया।
सात सवाल : लोककथा पर आधरित रोमांचक उपन्यास
दरअसल मुनीरशामी शाहाबाद की रूपवती स्त्री हुस्नबानो से विवाह करना चाहता था। वह हुस्नबानो से मिलकर उससे विवाह की इच्छा व्यक्त करता है। हुस्नबानो ने उसके सामने सात जटिल और रहस्यमय सवाल रखे, जो इस प्रकार हैं-
1. एक बार देखा है, दूसरी बार देखने की इच्छा है। (यह प्रश्न सौंदर्य और सत्य के आकर्षण का प्रतीक है। इसका अर्थ केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि जीवन के उन अनुभवों से है जो इतने प्रभावशाली होते हैं कि मन उन्हें बार-बार जीना चाहता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा सौंदर्य आत्मा और अनुभव में निहित होता है।)
2. नेकी कर दरिया में डाल। (यह सवाल निःस्वार्थ परोपकार का प्रतीक है। इसका संदेश है कि भलाई करते समय किसी प्रतिफल या प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सच्ची नेकी वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के की जाए।)
3. किसी के साथ बुराई न कर, अगर करेगा तो वैसा ही पाएगा। (यह प्रश्न कर्मफल के सिद्धांत को दर्शाता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।)
4. सच बोलने वाला हमेशा खुश रहता है। (यह सत्य और आंतरिक शांति का प्रतीक है। सच्चाई व्यक्ति को मानसिक संतोष और आत्मविश्वास देती है, जबकि झूठ अंततः भय और अस्थिरता पैदा करता है।)
5. कोहनिदा पहाड़ का राज क्या है? (यह प्रश्न रहस्य और ज्ञान की खोज का प्रतीक है। जीवन में कई गूढ़ सच्चाइयाँ होती हैं, जिन्हें समझने के लिए साहस, जिज्ञासा और धैर्य की आवश्यकता होती है।)
6. जनमुर्गी के अंडे के बराबर दूसरा मोती ला दे। (यह असंभव प्रतीत होने वाली चुनौती का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि जीवन में ऐसे लक्ष्य भी होते हैं जो असंभव लगते हैं, लेकिन दृढ़ संकल्प और प्रयास से उन्हें हासिल किया जा सकता है।)
7. हम्मामबादगर्द का रहस्य क्या है? (यह प्रश्न भ्रम और वास्तविकता के बीच अंतर को समझने का प्रतीक है। जीवन में कई ऐसी स्थितियाँ होती हैं जो बाहर से आकर्षक लगती हैं, परंतु उनके भीतर सच्चाई कुछ और होती है। यह विवेक और सही निर्णय की परीक्षा है।)
हुस्नबानो उससे कहती है कि यदि वह इन सभी सवालों के जवाब ले आएगा तो वह उसके साथ विवाह कर लेगी। हुस्नबानो के सवालों के सुनकर मुनीरशामी निराश हो जाता है और दीवानों की तरह भटकने लगता है।
मुनीरशामी की यह दशा देख कर हातिम द्रवित हो जाता है। वह उसकी मदद करने के लिए हुस्नबानो से मिलता है और उससे वादा लेता है कि वह उसके सातों सवालों के जवाब ला देगा, लेकिन उसे शादी मुनीरशामी से ही करनी होगी। हुस्नबानो इस पर अपनी सहमति दे देती है। यह सुनकर हातिम मुनीरशामी को विश्वास दिलाता है और सवालों की खोज में निकल पड़ता है।
रास्ते में हातिम का सामना अनेक भयावह स्थितियों से होता है। वह साहस और बुद्धिमत्ता से हर कठिनाई का सामना करता है। इस खोज अभियान में हातिम अलग-अलग लोगों की मदद करता है, कठिन परिस्थितियों में अपना साहस बनाए रखता है और नैतिक निर्णय लेता है। अंततः वह सभी सवालों के उत्तर खोज निकालता है, जिससे मुनीरशामी और हुस्नबानो का विवाह हो जाता है।
परोपकार और मानवीय मूल्यों से भरपूर इस हैरतअंगेज कहानी को वर्तमान परिवेश में एक दादाजी द्वारा अपने पोतों को सुनाई जा रही कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कथा पाठकों में नैतिकता की भावना का बीजारोपण करती है।
यह उपन्यास ‘स्वतंत्र भारत’ (16 जुलाई 1995–01 अक्टूबर 1995) में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ तथा बाद में 1996 में कुशी प्रकाशन, इलाहाबाद से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया।
'ग्यारह बाल उपन्यास' (संपादित) का सार संक्षेप
'ग्यारह बाल उपन्यास' हिन्दी बाल उपन्यासों का एक प्रतिनिधि संकलन है, जिसमें आधुनिक समय के 11 महत्वपूर्ण लेखकों के उपन्यासों को संकलित किया गया है। यह पुस्तक दो खण्डों में प्रकाशित है। पहले खण्ड में 5 बाल उपन्यास तथा दूसरे खण्ड में 6 बाल उपन्यास संकलित हैं। दोनों खण्डों के लेखकों और उनके उपन्यासों का विवरण इस प्रकार हैः
प्रथम खण्ड
अंतू की आत्मकथा - डाॅ. श्रीप्रसाद
हम होंगे कामयाब - जाकिर अली ‘रजनीश‘
हांकू बाबा - रामनरेश उज्जवल
मिशन इम्पाॅसिबल - रमाशंकर
गांव की तस्वीर - मो0 साजिद खान
द्वितीय खण्ड
लाखों में एक - उषा यादव
सीपियाण्डेला की सैर - शोभनाथ लाल
पापा की खोज - साबिर हुसैन
एक था रमुआ - रोहिताश्व अस्थाना
पीली फाइल - संजीव जायसवाल ‘संजय’
बीनू का सपना - अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’
पुस्तक के प्रथम खण्ड में संग्रहीत उपन्यास 'अंतू की आत्मकथा' एक सामाजिक बाल उपन्यास है, जिसमें गरीब परिवार में पैदा हुए बच्चे और उसकी त्रासदी का भावपूर्ण अंकन है। संग्रह का दूसरा उपन्यास 'हम होंगे कामयाब' बाल अधिकारों पर केंद्रित है। यह सेठ लक्खूलाल की कैद में काम करने वाले बंधुआ बच्चों को आजाद कराने की कहानी है। 'हांकू बाबा' एक हास्य उपन्यास है। इसके नायक हांकू बाबा को गप्प हांकने में महारत है। वे लोगों को हंसा कर अपने भीतर छिपे दर्द को दबाए रखते हैं। लेकिन अंत में कुछ ऐसा होता है कि वे गांव की इज्जत के लिए अपनी जान को भी दांव पर लगा देते हैं। संग्रह के अगला उपन्यास 'मिशन इम्पाॅसिबल' एक साहसिक कहानी है, जो आतंकवादियों से मुठभेड़ के बहाने आदिवासियों की परम्पराओं से भी परिचित कराती है। प्रथम खंड का अंतिम उपन्यास 'गांव की तस्वीर' विकास की दौड़ में पिसते और पीछे छूटते गांव के कटु यथार्थ को हमारे सामने लाती है और बदलाव की हृदयविदारक तस्वीर को प्रस्तुत करती है।
पुस्तक के द्वितीय खण्ड का पहला उपन्यास 'लाखों में एक' एक बुद्धिमान और बहादुर लड़की की दास्तान है, जो अपने कारनामों से अपने परिवार ही नहीं लोगों की सोच भी बदल देती है। 'सीपियाण्डेला की सैर' एक साइंस फैंटेसी है, जो अपनी अनूठी कहानी के द्वारा पाठकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम है। 'पापा की खोज' दो साहसी बच्चों प्रदीप और सुदीप की कहानी है, जो जंगल में जड़ी बूटियां खोजने गये अपने पिता के खो जाने पर उन्हें खोजने का साहसिक कारनामा अंजाम देते हैं। संग्रह का तीसरा उपन्यास 'एक था रमुआ' एक घुमंतू परिवार के लड़के रामू की कहानी है, जो यूं तो भाख मांगने का काम करता है, लेकिन जब एक दिन उसका आत्मसम्मान जाग उठता है, तो उसी स्टेशन का स्टेशन मास्टर बन जाता है, जहां वह भीख मांगा करता था। 'पीली फाइल' एक जासूसी कहानी है, जो रोचकता और रोमांच से भरपूर है और पाठकों को अंत तक बांधे रखती है। इस खण्ड का अंतिम उपन्यास 'बीनू का सपना' पर्यावरण पर केंद्रित एक जानकारीपरक उपन्यास है और पाठकों को जागरूक करने के उद्देश्य से रचा गया है।
यह पुस्तक वर्षा प्रकाशन, 50, चाहचंद, जीरो रोड, इलाहाबाद से वर्ष 2006 में प्रकाशित हुई है।
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